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संदेस ~सुरभि नौटियाल


बस इतना ही कहूँगी........
कि समेट रखें दामन में कई मलाल हैं,
पर तुम्हारे अलावा बयां करना ना किसी से दिल का हाल है।
हैं ज़ख्म इस सीने में छिपे कई,
साथ तुम्हारा है उनका बस मरहम ही।
हंसती हैं आँखें ये दुनिया भर में,
हां महफिलें भी देखी इन्होने कई,
पर ख्याल तुम्हारे की ही चाहत है इस दिल को,
लाख मनाने पर भी यह माने नही।
ना जाने क्यों यह मन भी ज़िद्द पर है आ खड़ा,
ना जाने पहले इसमें किसी का अक्स भी ना पड़ा,
सवाल पूछती हूँ खुदसे भी यह,
ना जाने पहले यहाँ कोई आया ना,
ना जाने क्यों इसे पहले कोई भाया ना।
इस तरह यह अटका तुम्हारे ख़यालों में है,
कि पाए बिना तुम्हे ये खोने से है डरता।
हार गई हूँ इस पर अंकुश लगा लगा मैं,
नाजाने क्यों ये चाह फिर से तुम्हारी ही करता।
हां मानती हूँ कमी नही है चाहने वालों की,
ना हमें ना तुम्हे यह भी जानती हूँ।
पर तुम्हारी आवाज़ सुने बिना करार ना पाऊँ,
खुद ही खुद में यह भी जानती हूँ।

सवालों के सिलसिलों में इस कद्र हूँ खोई,
कि क्या तुम्हारी दुआओं में भी शामिल हूँ?
. अगर हूँ तो आकर कह दो ना
तुम्हारे ही उत्तर की आस में हूँ।