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ये नाम राधा
सोचते ही मन में त्याग समर्पण प्रेम का पर्याय लगता है ये नाम राधा ...
ना में कृश्न की दीवानी ना में इसकी भक्त
बस परीकथा के जैसे बचपन से कहानियां सुनी थी प्रेम की ...
हर बार सोचती कान्हा की इतनी रानियाँ थी तो एक और हो जाती क्यों राधा से ब्याह नहीं रचाया ..
क्या राधा ने ज़िद नही की होगी ? कि कान्हा ने मना किया होगा ??
क्या होगा वो आखिरी संवाद ,वो पीड़ा ,वो साथ न रहने का फैसला ,,, टूटे होगे ना दोनों..
कि, ऐसे ही राधा ने स्वीकार कर लिया होगा अपने प्रेम को किसी और की बाहों में जाता हुआ !!!
अकेली राधा ने कैसे बिताई होगी जिंदगी ...जब कि कान्हा तो अपने संसार में व्यस्त था ।मुझे ना ये खयाल बार बार आता है की क्या ये प्रेम की तब भी इतनी ही मिसाल दी जाती जब राधा अपने संसार मे व्यस्त हो जाती और कान्हा अकेला राधा के प्रेम में वन वन भटकता इंतजार करता पल पल को तरसता ???
क्या ये प्रेम तब भी इतना ही पवित्र कहलाता जब एक ब्याह स्त्री किसी और पुरुष से आजीवन प्रेम करती ,,
कान्हा को पता था कि जिस इंतज़ार की नदी के उस पर राधा आस लगाए बैठी है
उस पर ना कोई पूल बंधेगा जिस पर चल के राधा उसे मिल ने आएगी ...फिर भी क्यों प्रेम को राधा के मन में जगाया !!!

बस मुझे राधा नाम से लगाव सा लगता है अपने जैसा राधा की 'प्रीत' ....!!!!


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