...

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ज़रूरी
किसी को गिराना जरूरी था किसी को उठाने के लिए,
इंसानियत गिर गई ये बात समझाने के लिए।

हवाओं में सीधे तौर पर कोई दम न था,
साजिशें रचनी पड़ी चरागों को बुझाने के लिए।

भूखे पेट नींद कहाँ आती थी किसी को,
लोरीयाँ सुनानी पड़ी बच्चों को सुलाने के लिए।

वक़्त मिलता तो आवाम पूछती सवाल कोई,
सियासत आजमाती रही पैंतरे उलझाने के लिए।

सिरों का पकड़ में आना नाकाफ़ी था,
भरोसा जरूरी था रिश्तों को सुलझाने के लिए।

मधुर गीत , गज़ल ही काफी नहीं थे,
तेरा ख़्याल भी जरूरी था गुनगुनाने के लिए।
-राकेश अग्रवाल "साफिर"✍️
© साफ़िर