...

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कुसुम
अंग अंग से हर दृष्टी पर अलंकार हूँ
हूँ निर्वसन मैं तो भी तो श्रृंगार हूँ
बंधू क्यों बाह्य दल-पुंज के चीर से मैं
कुसुम देह से ही तो मैं मकरंदकार हूँ

© Ninad