...

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ताल्लुक़
दौर_ए_मोहब्बत में ताल्लुक़ तर्क_ओ_तार हो रहे हैं..
न जाने आबाद आँखें हुई हैं या बर्बाद दिल हो रहे हैं..

अब तुमने मान लिया है उसको ग़ैर खाँन
फ़िर क्यों तुम्हारे दिल से झगड़े हो रहे हैं..

वो खान ज़ादा नहीं कोई तुम्हारे मयार का भी नहीं
बावजूद इसके तुम्हारे उस्से ताल्लुक़ गेहरे हो रहे हैं..

खुशियाँ समेटो इनको आग लगाओ लड़की
उसने जो दिए थे गुलाब सूखे बेकार हो गए हैं..

चंद लम्हें जो मोहब्बत में किसी के आँख तले आ जाए
समझो इंतजार के सालों साल उस पर वाजिब हो गए हैं..

मोहब्बत में लौट कर आओ जब खाली हाथ तो
बड़ो से सुना है मोहब्बत में क़ामयाब हो गए हैं..

बस दिल के दर्द पर काबू पाना है क़ामयाबी इश्क़ में
ईतना ही करने में न जाने कितने बर्बाद हो गए है..

और आखीर मे तुम्हें लिखते है खान हम
तमाम बर्बादों में आज हम भी शामिल हो गए हैं..

© K_khan_lines ..KK.. ✍