...

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"प्रेम"अधूरा...मुक़म्मल
प्रेमिका की ख्वाहिश.....
ना चाहे हक़ दे सिंदूर का,
कुछ साँझ सी दस्तक ही
मंजूर ज़िंदगानी में तुमसे।

अर्धांगिनी का सब्र....
मिल जाता वो कांधा
जो राधा रही हर धुन श्याम की
मंजूर मीठी गुनगुनाहट ही तुमसे।

आख़िर.......
ये अतिृप्त अपरिपूर्ण प्रेम
ख़्वाहिशों के तारे
अधूरे मुकम्मल सिर्फ़ तुमसे!!
© सांवली (Reena)