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बेशक दर-बदर...❤️❤️✍️✍️( गजल)
बेशक दर- बदर ही भटकूंगा मैं
उसके प्यार को सर न पटकूंगा मैं

उसे ना हो मेरे होने का एहसास
उसके आस -पास ना फटकूंगा मैं

जो मेरे आंसुओं से नहीं पिघला
उसकी बांह पकड़ के लटकूंगा मैं

इससे अच्छा तो मन मार लूं 'सत्या'
उसके सामने जाऊं तो खटकूंगा मैं

बेशक वो मुंह मोड़ पर चला जाये
धड़कन बनके ही सही धडकूंगा मैं




© Shaayar Satya