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अब ख़ुद को प्रवासी कहते नहीं सुन पाएंगे
अब ख़ुद को प्रवासी कहते नहीं सुन पाएंगे।
ये पूरा वतन तो अपना ही था ना सोचा था कि कभी सीमाओं के बंधन में बंधकर रह जाएंगे,
छोड़कर अपने गांव का वो आंगन, जिस शहर को अपना बनाया वहां पराये भी कहलाएंगे,
पहुंचे थे जहां कमाने को दो वक़्त की रोटी,ना सोचा था कि वहां भूख से प्राण मुंह को आ जाएंगे,
जिन रास्तों को ,जिन सड़कों को अपने पसीने से सींचा ना सोचा उन्हीं रास्तों पर भटकते ठोकरों से पांव में छाले पड़ जाएंगे,
जब हमने अपने शहर को,अपने गांव को पराया बनाया था,तब सोचा ना था कि ये दिन हमारे पास भी लौट कर आयेंगे,
पर अब हम यू परायों से ना रह पाएंगे।
अब अपने शहर को,अपने गांव को गले लगाएगें
अपने गांव को लौट जाएंगे,वो हमारा आंगन ,वो पेड़- पौधें हमें जरूर अपनाएंगे,
अब रोटी के लिए कहीं प्रवासी बनकर नहीं जाएंगे,
जब तक खाएंगे अपनी माटी को सींच कर खाएंगे और फ़िर इसी माटी में मिल जाएंगे,
बहुत भटक लिए इस दुनियां में ,अब तो बस इसी खेत में अपनी दुनियां बसाएंगे, पेड़ की छांव में सो कर अपने सपनों को फ़िर जगाएंगे।
अब ख़ुद को प्रवासी कहते नहीं सुन पाएंगे।


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