...

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उस उम्र का उपवन
#MemoryGarden

मुझ संग यादें बहार की,
कयामत तक रहनी थी,
वो लालसा लाल की,
गुलाब के,
सुगंध रजनी की,
केशो में,
माला पंकज की गले में,
खिड़की से ताके,
दूर तक,
सिकाई अर्क की,
अरे देखो देखो,
सखी आ गई,
वो अल्हड़पन बेला का,
बड़ा भाता था मुझको,
तो सबके सिमटते ही,
सांझ हो चली,
चल घर जा,
याद मां की,
दिलाता था उपवन,
अब कहीं दूर हूं,
इन सब से,
कुसुम से,
नीरज से,
चम्पा से,
और सखी बेला से भी,
मेरे यादों के,
केशो में महकती,
रजनी से भी,
पर भीनी भीनी खुशबू है,
अब भी,
जैसे,
अभी अभी खिलते,
मोगरे की...

#writopoem
#after age effect


© --Amrita