...

2 views

चलन

© Nand Gopal Agnihotri
लघुकथा
कृषक परिवार के एकलौता सपूत,चल गयिले मुंबई रोजी-रोटी के तलाश में।
कुछ साल कमवला के बाद आपन बियाहल मेहरारू के साथ गांव पहुंचले, बूढ़ा बाबा के त ठकठकी मार गयिल।
अंखियां झुका के नीचे ताके लगले।
तब बेटा बोलल, हे बाबूजी होखीं ना हैरान,केकरो करीं ना अपमान।
अब ऊ राउर जमाना नयिखे कि केहू दस हाथ के मारकीन लपेट के रही अपना देंहियां में।
अब जमाना बा टाॅपलेस,
पतोहू होखे चाहे बेटी सबकर इहे ड्रेस।
नन्द गोपाल अग्निहोत्री