...

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Hale Dil...
कभी तुम पास बैठो तो ,
बताएं अपना हाले दिल ,
सब कुछ खो के बैठें हैं ,
हुआ न कुछ अभी हाँसिल।


चलता जा रहा हूँ बस ,
यूँही अनजान रस्ते में ,
अँधेरा है बहुत गहरा ,
दुँधली सी दिखे मंजिल।


मेरा दिल दोड़ने वाले ,
जरा रुख तो इधर कर ले ,
मेरा दिल तोड़ कुछ ऐसे ,
की हो तुझको भी कुछ हांसिल।


मेरा पैगाम पढता है ,
तो पढ़ कुछ संजीदा होकर ही ,
कि सुनने वाला ये समझे ,
तू है वही जाहिल।


बहुत आवाज आयी थी ,
गिरते उन दरख्तों से ,
जिसे महफूज रखा था ,
उसी ने धूप बारिश से ,
चलाई उसने ही आरी ,
की वो तो है बड़ा संगदिल। ...




---नवनीत कुमार
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