...

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धुंधली सी आस
अपूरे से हैं कुछ सपने
और सपनों में है काश....
इन सपनों को छानता
झीना-झीना विश्वास
शायद पूरे हों कभी
धुँधली सी है आस
कुछ पाया , कुछ बाकी  है
एक अधूरी प्यास...
थक जाता हूँ , लेकिन
ये मन होता नहीं हताश
इक आशा की डोर पकड़
चल रही हैं मेरी श्वास

© बदनाम कलमकार